Showing posts with label हिंदी. Show all posts
Showing posts with label हिंदी. Show all posts

Monday, July 21, 2014

जो है आज है अभी है

जो है आज है अभी है,
कल किसने देखा है।

आज जो जी ली बस वही ज़िन्दगी है,
कल की सुबह हो ना हो,
कल किसने देखा है।

उस खुदा को शुक्रिया हम करते हैं।
जो भी खुशियाँ दी उन्हें याद हम करते हैं।
गम और दुःख भरे जो पल थे,
उन्होंने भी कुछ ना कुछ सिखाया हमें,
उन्हें भी सलाम आज करते हैं।

जितनी भी जी ली बस वही ज़िन्दगी है,
कल की सुबह हो ना हो,
आखिर कल किसने देखा है।

Saturday, June 28, 2014

बस जीवन है।

ना दिन है मेरा, न रात हुई अपनी।
बस जीवन है।

ना शोर है कहीं, ना ख़ामोशी ही रही।
बस जीवन है।

ना पास है कोई, ना दूरियां रही।
बस जीवन है।

ना हाथों में कुछ है, ना खाली हथेलियाँ।
बस जीवन है।

ना कहीं जाने की चाह, ना कहीं थम्मे ये कदम।
बस जीवन है।

ना भीगी ये धरती, ना रुकि ये बारिश।
बस जीवन है।

ना किसीको को पाने की चाह, ना किसीको खोने का डर।
बस जीवन है।

ना इसके होने की ख़ुशी, न इसके बिछड़ने का गम।
बस जीवन है।

बेजान, शांत, रुका हुआ सा, आगे बढ़ता, बस जीवन है।

Thursday, February 14, 2013

फिर वही शाम

फिर वही  शाम  है
फिर वही प्रश्नों का समुन्दर
फिर उसी भवर में ज़िन्दगी

फिर वही जाम है
फिर वही अनचाहा सा जश्न
फिर उसी सन्नाटे में ज़िन्दगी

फिर वही चाँद है
फिर वही रात का बंजारापन
फिर उसी लम्हे को थामे ज़िन्दगी
image source: liberatingchoices.com


Phir vahi shaam hai
Phir vahi prashno ke samundar
Phir ussi bhavar mein zindagi

Phir vahi jaam hai
Phir vahi unchaha sa jashn
Phir ussi sannate mein zindagi

Phir vahi chaand hai
Phir vahi raat ka banjarapan
Phir ussi lamhe ko thaame zindagi

बिखरी हुई ज़िन्दगी

बिखरी  हुई ज़िन्दगी को समेटूं कैसे 
अपने ही हाथों से छूटे अपनों को ढूँढूं कैसे 
प्यार की खोज में जिस ज़िन्दगी को अपनाया था 
नफरत भरे लम्हों में उसी को भिगो दूँ कैसे 

जिस राह पर विश्वास की चाह थी 
धोके भरे क़दमों को उस्सी राह पर चलते हुए सहूँ कैसे 
दिल को भरोसे से किया था जिसके हवाले 
उसी के आक्रोश से अपने दिल को टूटने से बचाऊं कैसे 

बिखरी हुई इस ज़िन्दगी को अब जियूं कैसे !
image src: freehdphotogallery.blogspot.com 

Friday, November 23, 2012

ऐ खुदा

ऐ खुदा तुझसे पुछा मैंने

क्या मेरी इबादद तुझ तक पहुंची है?

अश्कों भरी निघाहों से जो पूजा है तुझे

क्या उन अश्कों की गर्माहट तुझ तक पहुंची है?



ज़िन्दगी की तन्हाई जो समां गई है मुझमे

उस तन्हाई में की गई मेरी फरियाद क्या तुझतक पहुंची है?

ऐ खुदा तुझसे पुछा मैंने

क्या मेरी इबादद तुझ तक पहुंची है?



मुस्कुरा कर तूने मेरे हर प्रश्न को इनकार कर दिया

मेरी हर इबादद और फ़रियाद को अस्वीकार कर दिया

मेरी तन्हाईयों के साथ यूँ अकेला न छोड़ मुझे

गलतियाँ तो हुई हैं मुझसे ज़िन्दगी में

पर उन्हें माफ़ करके आज़ाद कर दे मुझे

तेरे सहारे कई बार एक नयी शुरुआत की है मैंने

इस बार मेरी ऊँगली थाम कर किनारे तक पहुंचा दे मुझे



ऐ खुदा तुझसे आज फिर पुछा है मैंने

क्या मेरी झुकी नज़र और थमी साँसों की टीस

क्या मेरी हारी हुई खुशियों की चीस

ऐ खुदा क्या तुझ तक पहुंची है ?

Friday, July 6, 2012

मेरे क्यूब का मौसम

कड़कती धूप हो 
या बारिश की ठंडी बूँदें
मेरे क्यूब का मौसम एक सा ही रहता है
खिड़की पर पड़े ब्लाइंड को ज़रा रोल कर लेती हूँ
आज बाहर मौसम कैसा  है, महसूस नहीं
बस देख लेती हूँ।

वैसे तो सब शांत है आज यहाँ
पर पास के खाली प्लोट में बुल्ल्दोज़र के चलने से
क्यूब मेरा अचानक से हिल उट्ठा है।

बाहर ऑफिस गार्डेन में कुछ लोग चाय पीते नज़र आए
दिमाग ने पेट को याद दिलाया की आज उसे भी चाय नसीब नहीं हुई है !
उठकर क्यूब से निकलने को मन नहीं हो रहा था
पर पेट की पुकार सुनकर पंट्री तक का सफ़र करना ही पड़ा।

वापिस क्यूब में आई तो लैपटॉप हेंग हो रखा था
जाने इसे कौनसे मौसम का बुखार उठा था ?
फिर नज़रें खिड़की से बाहर गईं
बादलों ने आसमान को घेरा हुआ था
टिप टिपाती बूंदों ने हरी घास पर निशाँ बना रखा था
पर मेरे क्यूब का मौसम नहीं बदला, सब वैसा ही था।

Tuesday, June 19, 2012

आज फिर लिखने को कुछ कहा इस दिल ने

आज फिर लिखने को कुछ कहा इस दिल ने ।
वो शब्द जो दब गए थे रोज़ मरहा की भाग दौड़ में, 
उन्हें उभारने को कहा इस दिल ने ।

आज फिर एहसास हुआ की हर कोई यहाँ अकेला है।
दिमाग भागता है दुनिया को कुछ और दिखाने को,
और ये दिल ढूँढता है अपना हमसफ़र ।

पर ना तो दुनिया सरहाती है इस दिमाग को
और ना ही कोई हमसफ़र अपना हो पाता है ।
कई एहसासों को अपने में समेटकर, हम जी रहे हैं इस ज़िन्दगी को
जाने कब रूह को मिलेगी आज़ादी ।


जाने आज क्या कुछ उभर आया इन शब्दों में,
आज फिर लिखने को कुछ कहा इस दिल ने ।

Thursday, June 14, 2012

थिरकते क़दमों में घुंघरुओं की खनखनाहट

थिरकते  क़दमों में घुंघरुओं की खनखनाहट
झूमते हुए उसका संगीत से रूबरू होना 
नाज़ुक कलाहियों में उन चूड़ियों का खनकना
रौशनी की हर किरण पर उसकी बिंदिया का चमकना

वो रंगमंच उसका जहाँ बन गया
बिना किसी शर्त के उसका साथी हो गया
उसका नाच ही उसका दोस्त
उसका नाच ही उसका हमसफ़र

थिरकते  क़दमों में घुंघरुओं की खनखनाहट 
झूमते हुए उसका संगीत से रूबरू होना

Wednesday, June 13, 2012

किस मंज़िल की ओर

बरसती है आँखों से
बूँदें बनकर हर चाह


झुलसती है
तपती रेत पर बिखरकर
ज़िन्दगी की हर राह

खिसकते हुए कदम बढ़ रहे हैं
जाने किस ओर
ना है मंज़िल का पता
ना ही राह की होश

बरसती आँखों से ज़िन्दगी जी रहे हैं
रौन्धते हुए अपने ही दिल को 
झुलसती रेत पर
ना जाने किस मंज़िल की ओर 

Tuesday, June 12, 2012

कली

खिलने के इंतज़ार में बैठी एक डाली पर
हरी पत्तियों के बीच 
नन्ही कली 

तेज़ सूरज की किरणों को तरसती 
उस डाली पर अकेली 
एक कली 

दिन के उजाले के साथ आयी 
सूरज की वो मद्धम किरण 
छू गई हरी पत्ती को 
तो राह बन गई जिसको तरसती थी 
कली 

हवा का भीना सा एहसास हुआ 
सोंधी सी खुशबू महकाती 
अपनी लाली बिखेरती 
अंगड़ाई ले खिलने लगी 
कली 

Monday, June 11, 2012

सिसकते होटों की वो हँसी


सिसकते होटों की वो हँसी 
 छुपाये बैठी है जाने कितने राज़ 
अनगिनत सूने पलों को 
बनाकर अपना राजदार,
वो हँसी। 

सूखी आँखों में छिपी 
आंसुओं की बाढ़ को थाम कर, रोक कर 
खिलखिला रही है 
इन होठों पर,
वो हँसी। 

सूनी राहों पर टूटती आस को ,
हर अँधेरे को 
उजाले में बदलती, 
वो हँसी।
  
हाथों से हर पल सरकती 
इस ज़िन्दगी को,
पक्की डोर से बांधे 
सिसकते होटों की वो हँसी।

और क्या कहें हम


और क्या कहें हम, हर सांस तुम्हारी है 

हर लम्हे में अब आर्ज़ू तुम्हारी है!

बस इक बार हमें संग ले चलो 

हमारी ये सारि ज़िन्दगी तुम्हारी है! 

वोह शाम

सूरज ढल रहा है पर चाँद अभी निकला नहीं
आसमान लाली की गर्माहट ओढे है
सितारे तलाश रहे हैं रात की शीतलता

विचित्र सा समां है
जैसे कोई नवेली दुल्हन
कुछ सिमटी कुछ घबराई
इंतज़ार में हो एक नई ज़िन्दगी की
चारों और दोराहों का मिलन हो रहा है
शाम का आँचल ओढ़े हवा झूम रही है
पंछी लौट रहे हैं घौंसलो की और
मझधार पर आकर जैसे सब थम गया हो
इक नयी सुबह इक नयी राह तलाशता
बढ़ चला है हर जीव
रात की गोद में, सर झुकाकर 

हरी टहनी


भयभीत सी
ठेहरी सी
हर आहट है कुछ  सहमी सी
तेज़ हवायें नहीं
सन्नाटों का शोर है
आक्रोश, कहीं गम्गीनियों कि भोर है
बंजर ज़मीन पर
जल की एक बूँद को तरसती
अकेली खड़ी
आखरी साँसों से जूझती
वो हरी टहनी